Meaning of Gunchaa

शुक्रवार, अप्रैल 28, 2017

तिरंगा बोला...

बिकता हूँ मैं इन दुकानों में

लहराता हूँ मैं आसमानों में,

कभी किसी बच्चे के हाथों में समां जाता हूँ

तो कभी किसी मंत्री के मेज़ की शोभा मैं बड़ता हूँ

और नए दौर के फैशन के चलते जाने कहाँ - कहाँ नज़र आता हूँ

पर कीमत मेरी, सरहद के उस फौजी से पूछो

जो मेरी शान की खातिर उपना सब कुछ नियोछावर कर जाता है

और अंतिम यात्रा में भी वो मेरे, आंचल तले सो जाता है

नाकि उस व्यक्ति से पूछो जो चंद सिक्कों की खातिर मुझे बेच आते हैं...

सच पूछो तो उसदिन मेरी आत्मा के चिथड़े - चिथड़े हो जाते हैं

पर फिर भी मैं हूँ सब कुछ सहता, चाहे अखियों से है नीर बहता

तीन रंगों का मेल हूँ मैं

हर रंग मेरा अपना महत्व दर्शाता है

तभी हर व्यक्ति के दिल में, अपने लिए मुझे कुछ प्यार नज़र आता है

रंग 'पी' के प्यार का...

रंग वही अच्छा जो सब में घुल जाए

घुले ऐसा की फिर धुले न धुल पाए

धोए- धोए धोबी उसे, आपन ही रंग जाए

रंग इतना गहरा की मधिरा भी फीकी पड़ जाए

जो मन पे लागे एक बार, तो वह भी बावरा हो झूम जाए

बावरा मन फिर जाने कौन से रंग में रंग जाए

जो देखे खुद को आईने में हर रंग अपना ही भा जाए

अपने हर रंग में उसे कई रंग नज़र आए

उन्हीं रंगों में रंग के "मीरा" जोगन कहलाए




-मनप्रीत 

गुरुवार, अप्रैल 27, 2017

चुनाव

चुनाव के season में एक नेता जी मेरे घर आए
हाथ जोड़े और थोड़ा मुस्कुराए
नाम में उनके बहुत दम था,
चुनाव चिन्ह उनका Atom Bomb था।
बोले इस बार तुम अपना मत मुझे ही देना
हमारी पार्टी आपकी ज़िन्दगी को स्वर्ग जैसा बना देगी
और आपको स्वर्गवासी का दर्जा देगी।

बोले, चाहे जितनी भी सेहनी पड़े मुझे ज़िल्लत
बियर, दारू, वोदका की नहीं होगी किल्लत
खैनी, गुटखा हर जगह मिलेगा
और बीड़ी, सिगरेट, subsidised रेट पर बिकेगा

Valentines day को सरकारी छुट्टी घोषित कर दी जाएगी
पतियों की उस दिन की सैलरी, पत्नियों को गिफ्ट में दी जाएगी।
आशिक़ों को भी पूरा सम्मान दिया जाएगा,
तीन से ज़्यादा girlfriend संभालने वाले को पदमश्री से सम्मानित किया जाएगा।

Security में नहीं कोई ढील होगी,
हर चोर से अपनी, एक फिक्स डील होगी
CCTV कनेक्शन हर और होगा
Wifi signal मुफ़्त का है, इसलिए थोड़ा कमज़ोर होगा

बिजली, पानी भी हर जगह सप्लाई होगा
रोटी हो न हो, पर हर घर में टाटा स्काई होगा
बीवी का हर हफ़्ते माइके जाने पर बैन कराया जाएगा
और, ससुराल से आने वाले सामान पर GST लगाया जाएगा

मिलके हम ऐसा खुशाल देश बनाएंगे
की US वाले भारत की citizenship को तरस जाएंगे

मैं बोला, नेताजी वादे तो आप खूब करते हैं
सपने भी बहुत दिखाते हैं
पर 5 साल तक नाजाने किस बिल में घुस जाते हैं
लेकिन हर नेता भिखारी बन जाता है
जब मेरे देश में चुनाव आता है...

-मनप्रीत 

शनिवार, फ़रवरी 28, 2015

कुछ तो चाहिए...


जीने के लिए चंद साँसे चाहिए,
ज़ेहन में किसी अपने की यादें चाहिए


सम्भलने के लिए एक सहारा चाहिए,
बहती नदी को एक किनारा चाहिए 

कुछ पाने के लिए, कुछ खोने का होंसला चाहिए,
उस खुदा पे थोड़ा सा भरोसा चाहिए


इबादत में थोड़ा सा असर चाहिए,
हर किसी को एक हमसफ़र चाहिए


शम्मा को परवाना चाहिए,
कृष्ण को भी मीरा सा दीवाना चाहिए 


फूलों को बहार चाहिए
और इस कविता को आपका थोड़ा सा प्यार चाहिए...


-मनप्रीत

बुधवार, जनवरी 01, 2014

हैप्पी न्यू इयर



वो ही होंगी तस्वीरें
वो ही होंगे नज़ारे
वो ही सूरज, चाँद रहेंगे
वैसे ही टिम- टिमाएंगे तारे,
क्या इस नए वर्ष में, कुछ बदलेगा प्यारे?

वो ही होंगे नेताओं के भाषण
वैसे ही महंगा मिलेगे राशन
एक साल ओर बीत गया कुछ झूठी उम्मीदों के सहारे,
क्या इस नए वर्ष में, कुछ बदलेगा प्यारे?

वैसे ही हम दफ़्तर जाएंगे
रोज़ की तरह ही मेट्रो में धक्के खाएंगे
कल भी जीतना होगा हमें, अपने ही सहारे
क्या इस नए वर्ष में, कुछ बदलेगा प्यारे?

वो ही आतंकवाद पुराना होगा
वैसे ही अनन्याये हमें इस साल भी सहना होगा
अब भी लड़कियां निकलेंगी घरों से भगवान के सहारे,
क्या इस नए वर्ष में, कुछ बदलेगा प्यारे?

बदलेगी तो सिर्फ ये तारीख़...

असल में साल वो ही पुराना होगा
केवल नए कपड़ों का कवच पहना होगा
जिस दिन खुल जाएंगे हमारे सोच के दायरे
उस दिन साल भी बदल जाएगा प्यारे...

" नया साल आपको बहुत-बहुत मुबारक हो..."

-मनप्रीत 

शनिवार, अगस्त 17, 2013

महंगाई डायन खाए जात है...

रुपया हुआ 60 का
अब "ठाट" किस बात का???

विदेश जाने का सपना अब सपना रह जाएगा
रुपया हमारा अब "Senior Citizen" कहलाएगा

इससे न तुम कुछ अब खरीद पाओगे
यौवन के किस्से इसके बच्चों को सुनाओगे

दूध, फल, सब्जियां सब महंगा हो जाएगा
आम आदमी को तो केवल "ठेंगा" ही मिल पाएगा 

पेट्रोल, डीजल, बजली के भी दाम बड़ जाएंगे
1000w का करंट हमारी जेबों पे लगाएंगे

स्कूटर, गाड़ियाँ अब कम चल पाएंगी
इनकी जगह अब साइकिल, बैल-गाड़ियाँ आ जाएंगी

ज्यादा नहीं तो थोड़ी सी ये बात मेरी मान लो
ज्ञान की ही बात इससे गाँठ तुम बांद लो

महंगाई के मौसम में इस बात कि है चर्चा
जो आमदनी हो रुपैया तो अठन्नी करो खर्चा

नहीं तो ये "डायन" (महंगाई) तेरे घर में घुस जाएगी
घर में घुस कर तेरा बजट हिलाएगी

ऐसे चलेगा तो मैं कैसे जी पाऊँगा??
क्या सांस लेने के लिए भी "टैक्स" चुकाऊंगा??


-मनप्रीत 

शुक्रवार, जून 07, 2013

वक़्त

कभी मेरा दिल कहता है...

की कोई इस जाते हुए वक़्त को थाम ले,

इस भागती हुई ज़िन्दगी को थोड़ा तो आराम दे...

कुछ पल ज़िन्दगी के मैं जी तो पाऊँ

इन उखड़ी हुई साँसों को संभाल तो पाऊँ,

एक नज़र खुद पे भी तो डाल लूं

क्यों न आज अपना ही पूछ मैं हाल लूं???

कुछ रिश्ते जिनकी कड़ियाँ मैं तोड़ आया हूँ

उन्हें फिर एक नाम दूं

उन खोई हुई तस्वीरों को, कुछ बिखरे हुए रंगों को कागज़ पे मैं उतार दूं

इससे पहले की वह कहीं खो जाएं

ज़िन्दगी फिर से बेरंग हो जाए

क्यों ना इस वक़्त को तस्वीरों के ज़रिए ही थाम लिया जाए...

सोमवार, जुलाई 30, 2012

एक आरज़ू...


कभी ये सोचता हूँ की ज़िन्दगी के कुछ सुन्हेरे पल
तेरे दामन में सर रख कर गुज़ार दूं ...

ये चंचल हवाएं तुम्हे मेरे पास ले आएं, और मैं...

...और मैं तेरी इन आँखों की गहराइयों में डूब जाऊं

तेरी इन जुल्फों के साए में ताउम्र यूँ ही गुज़ार दूं

तेरी इन बाहों का हार, जिन के लिए था मैं जन्मों से बेकरार,
आज उसे मैं अपना बना लूं...

पर फिर ये सोचता हूँ, जो तू मेरी ना हो सकी
तो मैं कैसे जी पाऊँगा ?

शायद इन्ही आँखों में, इन्ही बाहों में, इन्ही जुल्फों की जुस्तजू में
एक दिन स्वाह हो जाऊँगा...

पर सवाल ये है क्या फिर भी मैं तेरे दिल में घर कर पाऊँगा ???

रविवार, जुलाई 08, 2012

न जाने वो क्या है?


क्या कहूं मैं उससे की वो क्या है...

वो झूमती हवा है

या कोई छाई हुई घटा है...

वो फूलों सी कोमल है

या शांत पानी में कोई हल-चल है...

वो जीने की एक उम्मीद है

या मेरे दिल के बहुत करीब है...

वो चेहरे की मुस्कान है

या मेरे मन का कोई अरमान है

वो हाथों की लकीर है...

या मेरे माथे पे लिखी तकदीर है

वो ज़िन्दगी का एक सहारा है

या लहरों को मिल जाए वो किनारा है...

नहीं जानता हूँ मैं की वो क्या है

बस इतना ही कहूँगा की

वो हर पल मेरे साथ है

वो केवल एक एहसास है...



-मनप्रीत

रविवार, मई 27, 2012

मेहँदी..


इस कविता में मैंने एक बेटी के मन की व्यथा लिखने की कोशिश की है जिसके मन में एक
तरफ तो अपने पिया के घर जाने की ख़ुशी है, और दूसरी तरफ अपने पिता से बिचड़ने
का गम है।

मेहँदी मेरे हाथों की क्या कहती है बाबुल्वा
देस तेरा होयो परायो रे...

अंगना वो पीछे छूट गयो
सखी-सहेलडिया भी सब रूठ गयो
अन्सूअन संग ये बहता कजरा क्या कहता है बाबुल्वा
देस तेरा होयो परायो रे...




अब न सुन पाओगे तुम मेरी बतियन
अब न तुम्हारी गोद में सर रख के सो पऊंगी
मेरे हाथों का ये "चूड़ा" क्या कहता है बाबुल्वा
देस तेरा होयो परायो रे...

जो पल तेरे साथ बिताये मैंने, उनकी यादें छोड़ जाऊंगी
भाई-बहनों से मूंह मोड़ कर, पिया देस चली जाऊंगी
दिल की मेरी ये धड़कन ये कहती है  बाबुल्वा  
अब मैं तेरे अंगना से जल्दी ही उड़ जाऊंगी...
और बाबुल जैसा प्यार पिया देस पाऊँगी...

रविवार, अप्रैल 01, 2012

कभी तू कभी मैं...


कभी तू ना छत पर आ सकी
कभी मैंने मौका गवा दिया
कभी तू ना मुझसे कह सकी
कभी मैं कहते-कहते हिचकिचा दिया

कभी तू ना वक़्त पे पहुँच सकी
कभी स्कूटर मेरा चला नहीं
कभी तू ना मुझसे मिल सकी
कभी वक़्त मुझे भी मिला नहीं

कभी मैंने भी ज़ाहिर ना किया
कभी तू भी मुझे समझ ना सकी
कभी मैं तेरे बिन तड़पता रहा
कभी मिलके भी ये तड़प बुझ ना सकी

कभी मैं तुझे समझ ना पाया
कभी तू इतनी सरल हुई नहीं
कभी मैं ना गलती छुपा सका
कभी तूने भी माफ़ किया नहीं

गुरुवार, मार्च 01, 2012

बस तू चल

तू रौशनी की तरह चमकता चल
तू आंधी की तरह बढता चल
जो राह में आ जाए अड़चन
तू उसको भी कुचलता चल

जब तक तेरी बाज़ुओं में जान है
जब तक तेरे होंसलों में उड़ान है
तुझे न कोई रोक पाएगा
आत्मविश्वास न तेरा कोई तोड़ पाएगा

तू सूरज सा दमकता चल
तू ज्वाला सा देहेकता चल
खुशबू से तेरी खिल जाए गुलिस्तान
तू फूलों सा मेहेकता चल

माँ-बाप की आसीसों की छाया में

बस तू यूं ही चलता चल
बस तू यूं ही चलता चल...


-मनप्रीत

गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

कुछ मैं लिखना चाहता हूँ


कुछ मैं लिखना चाहता हूँ

पर लिख नहीं पाता हूँ 

फिर अपनी कलम उठाता हूँ

एक गहरी सांस भरता हूँ

आँखों को मूँद लेता हूँ

कुछ ख्यालों में फिर मैं खो जाता हूँ

उन रंगों का केवल मैं आभास कर पता हूँ

उस चेहरे को केवल मैं ख्वाबों में ही देख पाता हूँ

उस ख्याल को ज्यों ही मैं कागज़ पे उतारना चाहता हूँ

फिर एक पल मैं थम जाता हूँ

कुछ मैं लिखना चाहता हूँ

पर लिख नहीं पता हूँ


-मनप्रीत

रविवार, जनवरी 22, 2012

बच्चा बनना चाहता हूँ...


कुछ यादें जिनसे मैं नाता तोड़ आया हूँ 
एक उम्र जो पीछे छोड़ आया हूँ
उसे फिर मैं जीना चाहता हूँ 

आज मैं फिरसे बच्चा बनना चाहता हूँ

वो हमदम जो मुझसे रूठ गए थे
वो साथी जो कहीं छूट गए थे 
उन्हें फिर गले लगाना चाहता हूँ

आज मैं फिरसे बच्चा बनना चाहता हूँ

वो खेल जो हम खेला करते थे
वो रस्ते जहाँ मेले लगा करते थे
उन गलियों के रस्ते से, मैं फिर गुज़रना चाहता हूँ

आज मैं फिरसे बच्चा बनना चाहता हूँ

वो एक पल रूठना, और दूसरे ही पल मान जाना
वो अपने खिलोने किसी को न देना
आज उन खिलोनो से, मैं फिरसे खेलना चाहता हूँ

आज मैं फिरसे बच्चा बनना चाहता हूँ

वो सुबह स्कूल ना जाने के हजारों बहाने बनाना
वो आधी छुट्टी से पहले चुपके से लंच खाना
वो टीचर ना होने पर खूब हुडदंग मचाना
वो पल मैं ज़िन्दगी के फिर से जीना चाहता हूँ
आज मैं फिरसे बच्चा बनना चाहता हूँ...


-मनप्रीत

रविवार, दिसंबर 18, 2011

नैनों की भाषा



कभी किसी की याद में पलकें मेरी भीग जाती हैं
तो कभी ख़ुशी के मारे ये बिना वजह भर आती हैं
ना जाने ये आँखें क्या कहना चाहती हैं...

जो देख ले कोई प्यारभरी  नज़र से
शर्म से ये झुक जाती हैं
जागती आँखों से ही कितने, ख्वाब ये देख जाती हैं
ना जाने ये आँखें क्या कहना चाहती हैं...

कभी किसी की तलाश में बेचैन हो जाती हैं
बिछड़ जाए कोई अपना तो सारी रात जगाती हैं
हर पल सूरत उसी की फिर आईने में नज़र आती हैं
ना जाने ये आँखें क्या कहना चाहती हैं...

कभी ये सोचता हूँ दिल की मेरे व्यथा,
माँ कैसे जान जाती है?
जितना छुपाऊँ माँ तुझसे मैं
भेद मेरे ये सारे खोल जाती हैं
ना जाने ये कम्बखत आँखें क्या कहना चाहती हैं...

कौन जानता है किस मुसीबत में ये डाल दे हमें
ज़िंदगी की किन लहरों में डूबा दें हमें
हर पल हम जीते हैं,
हर पल हम मरते हैं
पर अब इन आँखों पे, हम भरोसा नहीं करते है...

शुक्रवार, अक्तूबर 28, 2011

एक राज़

हर राज़ मेरे तुम कहीं छुपा देना
दामन में अपने कुछ इस तरह दबा देना
कि कोई इसे फिर ढूंड न पाए
हाथों की लकीरों से भी इनके निशान मिट जाएं
तेज़ हवाओं के झोकों में
वो सफ़े कहीं उड़ा देना
हर राज़ मेरे तुम कहीं छुपा देना

जो हो तुम खफा मुझसे,
तो मुझे कभी जता देना
अपने इन एहसासों को
मेरी धड़कन तक पहुंचा देना
जो फिर भी समझ न पाऊँ तुमको
'नासमझ' मुझे कहला देना
पर ये राज़ तुम कहीं छुपा देना

चेहरा एक नकाब के पीछे छुपा रखा है मैंने
हर गुनाह को फूलों की तरह सजा रखा है मैंने

जब बहती नदी की धारा में
ये अस्थियाँ मेरी बहा देना
तब तुम चाहे सबको
ये राज़ भले बतला देना...

शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

जनलोकपाल


ये गाना "जनलोकपाल" को समर्पित है, जो की 1954 "जागृति" फिल्म के गाने "आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं" में कुछ बदलाव करके मैंने बनाया है, आशा करता हूँ की आपको पसंद आएगा

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आओ लोगों तुम्हे दिखाएं शमता जनलोकपाल की
इस बिल को तुम गले लगाओ ये क्रांति है बदलाव की

जनलोकपाल जनलोकपाल...
जनलोकपाल जनलोकपाल...

सबसे बड़े लोकतंत्र पे हमको भी अभिमान है
लेकिन कुछ लोगों ने करदी नीची इसकी शान है
भ्रष्टाचार के दल-दल में फंस गया ये हिंदुस्तान है
देखो फिर से मांगे हमसे मिटटी ये बलिदान है,

आओ लोगों तुम्हे दिखाएं शमता जनलोकपाल की
इस बिल को तुम गले लगाओ ये क्रांति है बदलाव की

जनलोकपाल जनलोकपाल...
जनलोकपाल जनलोकपाल...

अन्ना जी के पथ पे चलके आगे बड़ते जाना है
इस बिल को मिलके हमने संसद में पास करना है
इस ज्वाला को हमने अपने लहू से फिर जलना है
आने वाली पीड़ी को एक उज्वल देश थमाना है

आओ लोगों तुम्हे दिखाएं शमता जनलोकपाल की
इस बिल को तुम गले लगाओ ये क्रांति है बदलाव की

जनलोकपाल जनलोकपाल...
जनलोकपाल जनलोकपाल...



गुरुवार, जुलाई 28, 2011

मेरी नज़र से...(भाग-१)


जो बात आज मैं आप के सामने रखने जा रहा हूँ ये एक वास्तविक घटना  है  जिसे वैसे तो शब्दों में बयां करना मेरे लिए कुछ कठिन हैं क्योंकि वह एक एहसास हैं जिसे केवल महसूस किया जा सकता है परुन्तु फिर भी एक कोशिश कर रहा हूँ 

ये बात एक दोपहर की है, रोज़ की तरह ही मै मेट्रो से अपने दफ़्तर जा रहा था और रोज़ की तरह वो ही भीड़-भाड़, वो ही अफरा - तफरी का माहौल था, किसी को कहीं जाने की जल्दी तो किसी को कही जाने की । कोई अपने फोन पर बात कर रहा है तो कोई अपने वाज्य यंत्र पे गाने सुन रहा है और वहां दूर किसी कोने में एक प्रेमी जोड़ा एक दूसरे से अठखेलियां कर रहा है

पर दोस्तों इस सब अफरा - तफरी के माहौल के बीच जहाँ हर कोइ अपनी ही धुन में रंग है, दो शख्स मुझे कुछ अलग से दिखाई दिए जिन्होंने मेरा ध्यान अपनी और आकर्षित किया। अलबत्ता दोनों ही देखने में बहुत ही सामान्य नज़र आ रहे थे, दोनों ने सामान्य से ही वस्त्र पहने थे और दिखने में भी पड़े लिखे लग रहे थे। पर फिर भी उनमे और एक सामान्य व्यक्ति में बहुत अंतर था और वह अंतर ही उन्हें भीड़ से अलग करता था


हालांकि मैं उनसे कुछ ही फासले पर ही खड़ा था पर फिर भी उनकी गुफ्तगू नहीं सुन पा रहा था, पर वह दोनों स्वाभाव से बहुत ही जिंदादिल और खुशमिज़ाज मालूम पड़ते थे और उनके चेहरे से बहुत ही शीतलता छलकती थी एक पल तो दिल ने चाहा की उनकीं इस जिंदादिली का राज़ पूछूँ पर शायद हिम्मत नहीं जुटा पाया और केवल दो चार- कदम आगे बड़ा  के ही रुक गया। लेकिन अब भी में उनकी बातें नहीं सुन पा रह था, समझ नहीं पा रहा था की मेट्रो में शोर ज़्यादा था या मेरे कान ख़राब हो गए हैं। पर कुछ देर उन्हें गौर से देखने के बाद मुझे ज्ञान हुआ के वह दोनों बोल-सुन नहीं सकते, वह केवल इशारों की भाषा ही समझते हैं और ये ही बात उन्हें भीड़ से अलग करती थी 

उन दोनों को देख कर मुझे दुःख तो हुआ पर साथ ही साथ मैं बहुत हैरान भी हुआ ये देख कर की भला कैसे कोई बिना बोलने - सुनने की शमता के बिना इतना खुश रह सकता है? क्या हर पल उन्हें अपनी इस कमी का एहसास नहीं होता? क्या उन्हें रोज़ मररह की ज़िन्दगी में सामान्य लोगों के बीच हास्य का पात्र नहीं बनना पड़ता?

हम इंसानों की आदत होती है की अक्सर हम असामान्य चीज़ को एक-टुक  हो कर देखते हैं बिना ये सोचे समझे की हमारी ये निगाहें किसी को तलवार से गहरा ज़ख़्म  दे सकती है। बहराल इन सब सवालो का जवाब तो केवल वो ही व्यक्ति दे सकता है जो इन हालातों से गुज़रता है। 

हो सकता है मुझे केवल उनकी हंसी ही नज़र आई हो, उस हंसी के पीछे छुपा वह दर्द मेरी कमज़ोर नज़र न देख पाई हो "हम जो हँसते हैं तो उन्हें लगता है के हाल-ए-दिल अच्छा है, पर वह ये भूल जाते हैं की हँसते हुए भी आंसू टपका करते हैं " 

उन दोनों की वह मीठी सी मुस्कान मुझे आज भी याद है और मैं जब भी उसके बारे में सोचता हूँ अपने आप को सामान्य होने के बावजूद उनके सामने बहुत ही छोटा महसूस करता हूँ...

सोमवार, मई 02, 2011

बचपन


'मन' मेरा अब पहले सा नहीं रहा

कुछ ना कह कर भी ये 

बहुत कुछ कह जाता था

मेरे अंदर भी कहीं, बच्चा एक समाता था

जो हर पर हँसता था, गाता था

परेशानियों से दूर तक, ना कोई इसका नाता था

पर उम्र के साथ...

ना जाने इस मन को क्या हो गया है

जितना चंचल था ये पहले

अब उतना ही कठोर हो गया है

अस्तित्व मेरा अब तितर-बितर हो गया है

लगता है वो बच्चा कहीं खो गया है...

बुधवार, मार्च 30, 2011

तलाश...

यूँही सफ़र में चलते-चलते
कहीं मिल जाना

चंद घड़ियाँ ज़िन्दगी की
हमारे  साथ भी बिता जाना

यूँ तो चलना आता नहीं मुझे
किसी के साथ

पर तुम मुझे चलना
सिखा जाना

यूँही सफ़र में चलते-चलते
कहीं मिल जाना...

अगर तुम मिल जाओ तो ये सफ़र
आसानी से कट जाएगा

मेरी ज़िन्दगी का एक और सफ़ा(Page)
पलट जाएगा

अपने प्यार की थोड़ी सी मिठास
मेरे होंठों पर भी लगा जाना

यूँही सफ़र में चलते-चलते
कहीं मिल जाना...

जिस राह में तुम होगी
मैं उसी और अब चला आऊँगा

थाम लेना हाथ मेरा
वरना मैं भटक जाऊँगा

क्या हुआ जो जीने की अदा हम सीख न सके,
मरने के हुनर में माहिर हमें करा जाना

यूँही सफ़र में चलते-चलते
कहीं मिल जाना...

सोमवार, मार्च 21, 2011

हम "इंसान" कहलाते हैं?


गिरते हुए को थामते नहीं
हम पीछे हट जाते हैं
किसी घायल को देख सड़क पर
हम मूंह फेर जाते हैं

क्या फिर भी हम "इंसान" कहलाते हैं?

सारा दिन पैसों के पीछे
दौड़ते-दौड़ते थक  जाते हैं
पर दो पल चैन से जीने के
फिर भी कहाँ मिल पाते हैं

क्या फिर भी हम "इंसान" कहलाते हैं?

रात को हम हैं काम करते
दिन में फिर खर्राटे भरते
दिवाली, होली पे भी
अब हम दफ्तर जाते हैं

क्या फिर भी हम "इंसान" कहलाते हैं?

अपना ज़मीर तो बेच चुके
अब देश को बेच हम खाते हैं
राजा, कलमाड़ी के जैसे ही
देश का सर झुकाते हैं

क्या फिर भी हम "इंसान" कहलाते हैं?

कसाब को हम हैं पकड़ते
उसकी फिर हैं पूजा करते
फँसी देने की जगह
उसे हम "खसम" बनाते हैं
छींक ज़रा सी आ जाने पर
डॉक्टरों की फ़ौज बुलाते हैं
भूख लगने पर उसे
"बुट्टर चिक्केन" खिलाते  हैं

क्या फिर भी हम "इंसान" कहलाते हैं?

छोटी-छोटी बात पे
अपनों से  लड़ जाते हैं
जाने-अनजाने में अक्सर
कितनो का दिल दुखाते हैं
पर हमेशा ये भूल जाते हैं
के "गाँठ" लगे रिश्ते
आसानी से नहीं खुल पाते हैं

क्या फिर भी हम "इंसान" कहलाते हैं?

बुधवार, मार्च 02, 2011

अक्स

मन में फिर से हलचल सी होने लगी है,
शांत समुंद्र में लहरें फिर से उठने लगी है,
कुछ तो है ऐसा जो मुझसे कहीं छूट गया है,
क्या वो मेरा अक्स था जो मुझसे आज रूठ गया है?

'जी' के जंजाल में उलझ कर रह गया हूँ
एक अन-सुलझी पहेली सी बन कर रह गया हूँ
साँसे भी जीने के लिए अब तो उधार लेता हूँ,
बस इस ही तरह दिन-रात मैं गुज़ार लेता हूँ...

रेत की तरह ये वक़्त मेरे हाथ से फिसल गया है,
सेहरा(Desert) में मिटटी की तरह अब अक्स मेरा बिखर गया है...
न इल्म था की अपनी आशाओं की नब्ज़ कुछ इस तरह थम जाएगी,
के अपने ही आंसुओं से अपनी प्यास मिट जाएगी...
बस कटी पतंग के जैसे उड़ता जा रहा हूँ
बिना मंजिल के अब मैं चलता जा रहा हूँ
मन के चिरागों को अब किसी का खौफ नहीं,
इसीलिए अब इन्हें हवाओं से बचा रहा हूँ...

धूप के साए में अक्स मेरा कहीं छुप जाता है
आईने में भी अब वह मुझे नज़र नहीं आता है
इसकी तलाश में अब मैं आपके दर पर आया हूँ
मिले कहीं आपकों तो इससे मुझे मिला देना,
और अगर ये मुमकिन ना हो तो आज किसी रोते हुए बच्चे को हँसा देना...
 

गुरुवार, जनवरी 06, 2011

ना जाने क्यों?

ना जाने आज फिर क्यों मुझे वो इतना  याद आने लगे हैं,
जिन्हें भूलने में मुझे कईं ज़माने लगे हैं।
ना जाने क्यों मेरे दिल ने फिर उन्हें आज याद किया
जिन्होंने कभी दिल-ए-बर्बाद किया...

आँख बंद करते ही आज फिर वो सामने आ गए,
ना जाने क्यों इन भरते हुए ज़ख्मों को फिरसे वह सहला गए।
मैं तो उस मोड़ को छोड़ के आगे निकल चुका था,
ज़िन्दगी के मायने भी कबके मैं बदल चुका था,
पर ना जाने क्यों आज फिर वह मुझसे उस मोड़ पे टकरा गए,
शायद कोई बचा हुआ दर्द देने वापस आ गए...

पर अबके मैं उनका सामना ना कर पऊँगा,
इसीलिए देख के उनको आज मैं पलट जाऊँगा।
पर ना जाने क्यों वह मुझको इतना  रुला गए,
के ना चाहते हुए भी वह आंसू  बनके बहार आ गए...

मंगलवार, दिसंबर 14, 2010

टेक्नोलोजी




टेक्नोलोजी ने मानव को इस कदर घेर लिया है की वह इसके बिना जीवन जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। 
सुई से लेके मोबाइल तक, साईकिल से लेके हवाई जहाज़ तक, चश्मे से लेके कंप्यूटर तक हर वक्त वह इसके चक्रवियु में फंसा रहता है। बहराल हर चीज़ के कुछ फायदे भी होते हैं और कुछ नुकसान भी, पर इसी रोज़ मरहा में कभी कुछ मज़ेदार हास्य व्यंग भी निकल आते हैं, जैसे की एक दिन मैं हनुमान जी के मंदिर गया दर्शन करने को, तो देखा की हनुमान जी, जो की स्वयंम पवन पुत्र हैं उन पर बिजली का पंखा चल रहा है और पुजारी की जगह उसका टेप रेकॉर्डर भजन पड़ रहा है। यही नहीं मोबाइल का भी खूब उपयोग हो रहा है, कोन्फेरेंसिंग के ज़रिए इसी पे निकाह हो रहा है, बारातियों का भी खर्चा बच जाता है और प्रिय-जनों का आशीर्वाद भी
विडियो कोन्फेरेंसिंग के थ्रू मिल जाता है।

कंप्यूटर भी मनुष्य ने बहुत ही रोचक चीज़ बनाई है, केवल बटन भर दबाने की देर है और दुनिया भर की जानकारी आपके सामने होती है, और अब तो ऐसा सॉफ्टवेर भी इन्टरनेट पर पाया जाता है जो मच्छर भगाने के काम आता है,  "कच्चुआ जलाओ मच्छर भगाओ" अब कहां बोला जाता है क्योंकि ये कंप्यूटर ही अब मच्छर मारने के काम आता है। हमारा देश ऐसा देश है जहाँ अमबुलंस चाहे वक़्त पर पहुँच पाए, या न पहुँच पाए, पर हाँ पिज़्ज़ा ज़रूर आधे घंटे में पहुँच जाता है

नीलादांत अर्थात "ब्लूटूथ" की भी अजीब है माया, इसे कान पे लगाने के बाद व्यक्ति अपनी ही धुन में खो जाता है, ऐसे लगता है जैसे अपने आप से बतियाता है, इसी लिए उम्र से पहले बहरा वह कहलाता है। सुबह-सुबह अब सैर करने वो गार्डेन में कहां जाता, ट्रेडमिल पर ही दौड़ कर अपनी सेहत बनता है। दूध, दही पसंद नहीं, इसे अब कौन खाता है? विटामिन की गोली पे ही अपना जीवन बिताता है। "राजू तुम्हारे दांत तो मोतियों जैसे चमक रहे हैं" अब ये विज्ञापन टीवी पर नहीं आता है, क्योंकि अब "हैप्पीडेंट" खा कर ही राजू दांत चमकता है।

बेहतर ये ही है की सीमित प्रयोग ही इस टेक्नोलोजी का अच्छा है, क्यों की "दिल तो बच्चा है..."

शनिवार, नवंबर 13, 2010

रावण


दशहरा तो चला गया, पर रावण अभी मारा कहां है
उसने तो केवल अब, हमारा तुम्हारा रूप धरा है

गौर से देखो तो हम सबके, वह मन में कहीं समाता है
यही तो है जो तेरे-मेरे  मन में बैर जगाता है

दस सिर हों तो काट भी दूं, पर लाखों से न लड़ पाओगे
इसीलिए अगले साल फिर तुम इसे जलाओगे

कलयुग का ये रावण अबके और बलवान हो जायेगा,
इसे मारने के लिए, एक राम अकेला पड़ जायेगा

पर ना कोई राम ना ही घनश्याम, अबके न कोई आएगा
प्रेम भाव से देखो सबको
ये रावण स्वयम ही मिट जाएगा

सोमवार, अक्तूबर 25, 2010

मदहोशी...


होश में आकर बेहोश हो जाऊं इतना भी अब होश नहीं
मयखानों की गलियों  में मुझसा कोई मदहोश नहीं

तन्हाईयों से दोस्ती मेरी, गमों से अब कोई बैर नहीं,
अपने ही घर में अब यारों मुझसा कोई गैर नहीं

कल तक थे जो मेरे अपने, आज उनसा कोई बेगाना नहीं,
मेरे ही अक्स ने यारों, आज मुझको  पहचाना नहीं

सब कुछ तो पा लिया लेकिन,
थी आरज़ू जिसकी वो मिला नहीं
पर फिर भी उपरवाले तुझसे मुझको कोई गिला नहीं...

शुक्रवार, मार्च 12, 2010

कुछ हसरतें (Desires)


दिल तो चाहता है की

तेरी यादों के सहारे कुछ और

वक़्त गुज़ार लिया जाए,

तेरी इन घनेरी जुल्फों

के नीचे ये शब (रात)  गुज़र जाए,

तेरे साथ कुछ पल बैठ कर

तुझे हल-ए-दिल बयां करें,

ज़ानों पे तेरी सर रख कर

मदहोशी के आलम में खो जाएँ..

पर डर लगता है के

ये ख़्वाब कहीं यतीम न हो जाएँ...

बुधवार, मार्च 10, 2010

आज की ताज़ा खबर...

रोज़ सुबह मेरे घर का दरवाज़ा 'धम' से हिल जाता है,
न जाने ये सुबह-सुबह मुझको कौन जगाता है?
अक्सर दरवाज़ा खोलने से पहले वो गुम कहीं हो जाता है,
इस ही तरह सुबह-सुबह एक अख़बार मेरे घर भी आता है


चाय चुस्की लेते-लेते अखबार पड़ते हैं हम,
किसी सफे पर आती है हंसी, किसी पे आँखें हो जाती हैं नम,
कहीं हो रही फूलों की बारिश, कहीं 'पाक' रच रहा है साज़िश,
कहीं आसमान छूती महंगाई, तो कभी मनमोहन की कुर्सी डगमगाई.
रोज़ की आपा-धापी में एक शख्स फंस कर रह जाता है,
क्योंकि वह आम आदमी कहलाता है


आगे के पष्ठों पे जब हम नज़र दौड़ाते हैं,
तो common wealth की तैयारिओं के किस्से वहां पे नज़र आते हैं,
कहीं नयी बस्सें, कहीं मेट्रो की सवारी, इन खेलों की आड़ में सज गई दिल्ली हमारी
पर बेटी की शादी की तरह तैयारिया फिर भी रह जाएँगी, 
मेहमानों से ही तो अंत में stadium की कुर्सियां फिट करवाई जाएंगी
नाक कटेगी या बचेगी ये तो वक्त ही बतलाएगा,
पर किसी न किसी तरह ये common wealth निकल ही जाएगा


मुंबई के चर्चे भी अक्सर रोज़ अखबारों में आते हैं...
चाचा, भतीजे (राज, बाल ठाकरे) की लड़ाई में देशवासी पिस कर रह जाते हैं
कभी सितारों से माफ़ी मंगवाते, कभी उत्तर भारतियों को भागते
इनकी मानो तो मुंबई को एक ऐसा शहर बनाया जाए
जहाँ जाने के लिए VISA  लगवाया जाए
जहाँ प्रेम की बोली छोड़ कर मराठी बोली जाए
आओ एक ऐसा शहर बनाए जहाँ  केवल मराठी ही जी पाए


हर तरह की ख़बरों से ये हमें रुबरु करवाता है
बुश को पड़ा जूता... कहाँ, कैसे, किस मंत्री ने किस देश को लूटा,
कहाँ हुई रनों की बरसात, और कैसे स्वर्ण पदक जीत कर भी खाली रह गए हाथ
रोज़ नया इस जहान  का चेहरा हमें दिखलाता है,
ऐसा ही अखबार एक मेरे घर भी आता है...

मंगलवार, दिसंबर 01, 2009

सपने ऐसे जो टूट गए...


देखे जो इन आखों से मैंने वो सपने कैसे टूट गए,
मेरे होकर भी मुझसे वो बेगानों जैसे रूठ गए..
आशाओं के 'पर' लेकर मुझे गगन में उड़ना था
उम्मीदों की डोरी से आकाश नया ही बुनना था,
फिर किसने ये मोती माला के एक-एक करके बाँट दिए ?
जैसे उड़ती हुई चिड़िया के 'पर' किसी ने काट दिए...


अक्सर एक ख़्वाब रातों को मुझको भी सताता है,
देखना चाहता हूँ जब उसको, वह धुंधला सा पड़ जाता है..
मैं एक कदम ओर उसकी बढाता हूँ, वो दो कदम पीछे हट जाता है,
और जाते-जाते फिर मुझको एक ज़ख़्म नया दे जाता है...
ज़ख़्म ऐसा...
जिसको भरने में फिर एक ज़माना बीत जाता है...


पर भरते हुए ज़ख़्म कहीं एक टीस नई छोड़ जाते हैं,
जैसे खुश्क बहारों के मौसम में अपनी याद दिलाते हैं,
ऐसे ही सपने अक्सर मुझको रातों को आतें हैं...


सुना था हमने पर पता नहीं था, की हर सपना पूरा नहीं होता,
पर इनके टूट जाने से दर्द घनेरा है होता...


इसलिए...


इन सपनो को आज कहीं मैं फिर दफना कर आया हूँ,
आज फिर अपने अरमानो की कहीं चिता जला कर आया हूँ...

रविवार, नवंबर 15, 2009

मौला

ऐ खुदा ये दुआ है तुझसे...


की ज़िन्दगी के सफ़र जब मैं थक जाऊं, कदम आगे बढाते-बढाते पीछे हट जाऊं,
जब कोई हमनफस मेरे साथ न हो, और सर पर किसी रहनुमां का हाथ न हो,
ऐ मौला मदद कर, मदद कर, मदद कर...


तेरे ही दर पर किस्मतें सवर जाती हैं, बिन मांगे सब अर्ज़ियां कबूल हो जाती हैं,
पर न जाने मैं तुझे क्यों हूँ भूल जाता,  क्यों मुश्किल के वक़्त ही तू मुझे है याद आता,
क्यों गुनाह करने से पहले तेरा खौफ ज़हन में नहीं आता,
जब भी मेरा इमान डगमगाए, ऐ मौला मदद कर, मदद कर, मदद कर...


ज़िन्दगी भर तू मेरे जुर्मों को अपने पहलू में छुपता रहा...
हर मोड़ पे मैं तुझे भुलाता रहा,  और तू साए की तरह मेरे साथ आता रहा,
तेरे ही चीज़ को तुझे ही सौंप कर मैं एहसान जताता रहा, पर फिर भी तू मुस्कुराता रहा
जब मेरे काम बिगड़े तुने मुझे सहारा दिया, मेरी डूबती हुई कश्ती को तुने ही किनारा दिया
लेकिन उसे भी मैं अपनी हिम्मत बताता रहा, और मन ही मन अपनी पीठ थप-थपाता रहा...


तेरी बनाई इस दुनिया में या खुदा... में जिंदा तो हूँ !!!
पर अपनी ही निगाहों आज बहुत शर्मिंदा हूँ...
बस इतनी सी अर्जी है मेरी कुबूल कर, की कभी फुर्सत से मेरे भी गुनाहों का हिसाब कर,
और अगर हो सके तो हर शख्स को मुआफ कर...
ऐ खुदा बस इतनी सी अर्जी है कुबूल  कर, कुबूल कर, कुबूल कर...

बुधवार, अक्तूबर 14, 2009

कुछ कमी मुझ में ही होगी...

जो आज वो मुझसे रूठ गया,
कुछ कमी मुझ में ही होगी...
दिल ने चाहा उसे रोकना, पर रोक न सका,
कुछ कमी मुझ में ही होगी...


जहाँ झुकना था वहां झुक न सका,
जहाँ रुकना था वहां रुक न सका,
मंजिल तो करीब थी पर पहुँच न सका,
शायद इसलिए जो बनना था वो बन न सका,
कुछ कमी मुझ में ही होगी...


आँखें तो हज़ार थी पर, किसी का नूर बन न सका,
दिल तो हज़ार थे पर किसी में घर कर न सका,
सफ़र में दोस्त तो लाखों मिले, पर कोई दिलबर मिल न सका,


कुछ कमी मुझ में ही होगी...
कुछ कमी मुझ में ही होगी...


जिसका इंतज़ार था मुझे उसने मुझे देखा नहीं,
जिसके लिए रुका था मैं वो मेरे लिए रुका नहीं,
प्यार के खंजर से उसने मेरा कत्ल किया,
पर मैंने कहा दर्द अभी हुआ नहीं...


क्योंकि...


कुछ कमी मुझ में ही होगी...
कुछ कमी मुझ में ही होगी...

दिल तो रोता है मेरा भी,
पर कोई आंसू टपकता नहीं,
इस दुनिया के अंधियारे में
अब कोई हाथ मेरा पकड़ता नहीं

ज़रूर...

कुछ कमी मुझ में ही होगी...
कुछ कमी मुझ में ही होगी...

गुरुवार, अक्तूबर 08, 2009

INTEZAAR...Wait that never ends...



कमरे के एक कोने में मद्धम सी लौ जलती है,
न जाने किस उम्मीद में रोशन इस अन्जुमन को करती है,


जैसे- जैसे रात का नशा बढ़ता है, हल्का-हल्का सा सुरूर चढ़ता है,
चारों और सन्नाटा है, दूर तक कोई शख्स नज़र नहीं आता है


सन्नाटा पहले इतना खामोश न था, जितना आज सुनाई पढता है,
धीमे-धीमे घड़ी के कांटे यूँ चलते हैं, जैसे न चाह के भी अपना फ़र्ज़ पूरा करते हैं


जैसे-जैसे रात का शबाब चढ़ता है, लौ का नाच चलता है,
और कुछ देर बाद वह भी फड़-फड़ाने लगती है, जल-जल के उसकी साँसें भी उखड़ने लगती हैं


पर इस अन्जुमन में आज भी कोई नहीं आता है, लौ का तमाशा धीरे-धीरे आज फिर ख़त्म हो जाता है,
क्योंकि आज फिर एक दीये की लौ के इन्तेज़ार का कत्ल हो जाता है...