Meaning of Gunchaa

रविवार, अगस्त 02, 2026

इश्तेहार...





आवश्यकता है एक कमरे की...
जहां थोड़े सुकून से "सांस" ले सकूं

एक ऐसा कमरा...
जहां बिस्तर पे लेटूँ तो तुरंत नींद आ जाए

जहां तकिये के किनारे पर
पुरानी यादें मेरा इंतेज़ार न कर रही हों

रोशनी के लिए केवल एक छोटा सा बल्ब हो तो भी चलेगा
पर मन को रोशन करने वाली ऊर्जा भरपूर हो

मोबाइल, टीवी, जैसी आधुनिक चीजों का शोर ना हो
क्योंकि शोर... वह तो मेरे अंदर भी बहुत है

एक ऐसा कमरा...
जहां रात को आंख बंद करूं तो "झींगुर" का साज़ सुनाई दे
और सुबह आंख खोलूं तो पंछियों का संगीत

कोई पड़ोसी बात करने के लिए नहीं हो तो भी मैं रह लूंगा
उससे नहीं तो ख़ुद से ही अपना हाल कह लूंगा

पर हां... एक 2x2 का रोशनदान ज़रूर हो
जहां बैठ कर कुछ वक्त गुज़ार सकूं अपने साथ

ऐसा एक कमरा कहीं मिले तो मुझे बता देना
नहीं तो... "सांस" तो मुझे इस घर में भी आती है, कुछ उखड़ी-उखड़ी सी...


- मनप्रीत

गुरुवार, जून 18, 2026

दोस्त - भाग 2



दोस्त/ friends कई प्रकार के होते हैं

कोई सोने की तरह होते हैं
24 तोले से ज़्यादा, चमक उनकी नज़र आती है
वक़्त के साथ कीमत जिनकी बढ़ती जाती है

तो कोई चांदी की तरह होते हैं
समय के साथ चमक जिनकी फीकी पड़ जाती है
और कालिख़ अंदर की बाहर आ जाती है

कुछ होते हैं Best Friend
जो मुसीबत पड़ने पर सबसे ऊपर करते हैं Trend
और जिनपे आप कर सकते हो थोड़ा depend

कुछ होते हैं Social Media के दोस्त
जो बनाए थे तुमने, कि काम आ जाएं किसी रोज़
पर वो emoji बना के ज़ाहिर कर देते हैं खुशी या अफ़सोज़

कुछ दूर के दोस्त (Pen Friend)भी बन जाते हैं
राब्ता जिनसे चाहे ज़्यादा न हो, पर सहानुभूति देने के काम आते हैं

कुछ ऑफिस के ऐसे कॉलीग भी होते हैं
चहरे पे जिनके मुखोटा दोस्त का और तरकश में ज़हर वाले तीर होते हैं

पर कोयले की खान में कभी-कभी हीरा भी मिल जाता है
अदावतें दुनिया की ले के भी, वो तुम्हारे बाज़ू में खड़ा नज़र आता है


*तरकश- वो टोकरी जिसमें तीर रखते हैं
*अदावतें - दुश्मनी


- मनप्रीत

मंगलवार, जनवरी 06, 2026

वो बातें...



क्या कभी सोचा है कि...

वो बातें...

जिन्हें सुन के हम हो जाते हैं अनजान
मन के किसी कोने में होता है हमें उनका ज्ञान

वो बातें...

जिन्हें कह पाती नहीं ज़बान
उन्हीं बातों से दिल में उठता है तूफ़ान

वो बातें...

जिनसे तुम मूंह फेर लेते हो
हकीकत में तुम उन्हें स्वीकार कर लेते हो

वो बातें...

जिनका न अंत है, न कोई आगाज़ है
वह तो केवल समय बिताने का तुम्हारा प्रयास है

वो बातें...

जो ज़बां से नहीं आखों से की जाती हैं
उन्हें बयां करने में कुछ देर तो लग ही जाती है

वो बातें...

जो कहते नहीं तुम सब से
जानता हूं... करते हो अकेले में अपने रब से

वो बातें...

जो लोगों ने तुम्हे मेरे बारे में तुम्हें बताई हैं
सच मानो... उनमें थोड़ी सी सच्चाई है


- मनप्रीत




शनिवार, जनवरी 03, 2026

धुआं-धुआं



क्यों साँसे थम रही हैं
क्यों आँखें जल रही हैं
क्या ज़िंदगी की कीमत है कोड़ियों की भांति

क्यों दिन में भी धुआं है
क्यों रात है ज़हरीली
क्या समझौतों की ज़िन्दगी आज हमने जीली

क्यों मीटर AQI के लगे अब हांफने
क्यों सच्चाई के आंकड़े लगे तुम ढांकने
क्या सस्ती ज़िंदगी पर भारी है राजनीति

क्यों आसमान काला
क्यों दम ये घुट रहा है
ये साल मेरी ज़िंदगी के कौन लूट रहा है

क्यों सुट्टे सा भारी धुआं है अब सांस में
क्यों air purifier भी लगा है अब खांसने
क्या ज़िंदा और मुर्दे में फर्क नहीं है बाकी

क्यों झूठे हैं ये वादे
क्यों भ्रष्ट हैं इरादे
क्या नीयत में इनकी है खोट की मिलावट

क्यों सावधान होने का वक़्त है तुम्हारा
क्यों हर साल की ये अब बन गई कहानीजो
अब भी न खौला खून है नहीं वो पानी


- मनप्रीत

रविवार, अगस्त 03, 2025

दोस्त - भाग 1



वो जो मुझे गलत राह पे जाने से रोकता है
मेरी हर बुरी बात पे मुझे टोकता है


वो जो मेरे दिल की हर बात जानता है
मेरे हर दुख को अपना मानता है


वो जिसने मुझे कुछ बिगाड़ा भी
और ज़्यादा बिगड़ जाने पर कुछ फटकारा भी


ऐसा दोस्त, जिसने पापा की डांट खा के भी कुछ बोला नहीं
मेरा कोई राज़ उसने आजतक खोला नहीं


वो जिसके बिना मीठी चाय भी फीकी लगती है
न मिलूं उससे तो ज़िन्दगी मिर्ची से भी तीखी लगती है


जैसे बिना चखने के दारू का मज़ा नहीं आता है
वैसे बिना इनके हर नशा फीका पड़ जाता है


वो जिन्हें देखने भर से ही सांस आ जाती है मुझे पूरी
ऐसे कुछ दोस्त हैं, जो मेरी ज़िन्दगी में हैं ज़रूरी...


- मनप्रीत


रविवार, जुलाई 06, 2025

कभी मुझे भी याद रखना...

Click to listen the AI generated song of the
poem👇



चाहे होठों पे नहीं नाम मेरा पर दिल में अपने आबाद रखना
कभी मुझे भी याद रखना

यादों को मेरी भुला देना, खतों को मिट्टी में दफना देना
पर खुशबू उस मिट्टी की मन में कहीं छुपाए रखना
कभी मुझे भी याद रखना

कभी अगर अतीत की यादों में जाना चाहो
तो Google Photos में दबी रील को मेरी एक बार तकना
इसी बहाने कभी मुझे भी याद रखना

नंबर मेरा Delete कर देना, Step आखरी तुम ये Complete कर देना
पर FB के दोस्तों की लिस्ट में 'मित्र' मुझे बनाए रखना
कभी मुझे भी याद रखना

दिल से दिल तक जुड़ी तार में चाहे करंट न हो
पर सप्लाई बहाल होने की उम्मीद तुम जगाए रखना
कभी मुझे भी याद रखना


- मनप्रीत

गुरुवार, जून 12, 2025

मेरा प्यारा पायजामा...



Click to listen AI Generated Payjama Song.. ☝️

बड़ी शिद्दत से...
मैने एक पायजामा सिलवाया
उसपे धारियों वाला डिज़ाइन बनवाया
पर लोगों की बुरी नज़र उसे खा गई
चार दिन में ही बिचारे की सिलाइयाँ बाहर आ गई
"आसन" से वह कुछ इस तरह फट गया
जैसे भारत- पाकिस्तान दो हिस्सों में बट गया

कपड़ा उसका सूती था
लकीरें उसपे चमकदार थी
मनचाही कीमत देने को उसकी, पूरी दिल्ली तैयार थी
वो मेरी आखों का तारा था
4 कुर्तों को मेरे, उसका ही सहारा था

अब उसकी क्या मैं तारीफ करूं...

बिल्कुल भी नख़रे नहीं दिखाता था
Free size उसका हर किसी को पूरा आ जाता था
चाहे लंबाई में थोड़ा नाटा था
पर जो देख ले एक झलक, पहने बिना रह नहीं पाता था
वह दूर से नीला, और पास से पीला था
न कहीं से घिसा हुआ, न कहीं से ढ़ीला था
उसके रेशमी नाड़े को देख सब हैरान थे
कहाँ से लाए ऐसा पायजामा, ये सोच के मुहल्ले वाले परेशान थे

चाचा जी, ताया जी और "सो किलो" के फूफ़ा जी तक ने, उसे आज़माया था
पर हर किसी को उसमे, एक अपनापन नज़र आया था
लेकिन सबकी ख़्वाहिशें पूरी करते-करते "दम" उसका निकल गया
छोटी सी एक चीख के साथ, वो कई हिस्सों में बिखर गया
पर जाते-जाते भी वो अपना फर्ज़ अदा कर गया
अपने छोटे भाई "बरमुडे" (Shorts) को मेरे हवाले कर गया
पहन उसे अब, मैं अपना काम चलाता हूँ
खुली हवा का आनंद अब मैं, बरमुडे में पाता हूँ
मेरी अलमारी का हर कपड़ा आज बहुत उदास है
पर उसके जैसा एक और पायजामा अभी भी मेरे पास है

चाहिए हो आपको तो मुझे Comment में बता देना
फिर बाद में मत कहना, कि मेरे लिए भी एक सिल्वा देना


- मनप्रीत

मंगलवार, मई 06, 2025

लकीरें

 


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लकीरें कुछ इशारा कर जाती हैं

माथे पे आएं
तो चिंता बन के उभर आती हैं

हाथों में आएं
तो तकदीरें बन जाती हैं

चहरे पे आई लकीरें
तजुर्बे की गहराई बताती हैं

देशों में आए
तो सरहद कहलाती हैं

घर में आ जाए
तो बंटवारा कर जाती हैं

लकीर के इस पार या उस पार होने से
जीत हार तय हो जाती है

दिलों के दरमियां आई लकीरें
जल्दी से नहीं मिट पाती हैं

लकीरें कुछ इशारा कर जाती हैं


- मनप्रीत

बुधवार, अप्रैल 16, 2025

प्यार की फटी किताब...



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अलमारी के एक कोने में दबी...
प्यार की फटी किताब को आज जब हाथों में उठाया
कुछ बिखरे हुए सफों में, कुछ बिखरी हुई यादों को दबा पाया
हर लफ्ज़ को जब सांसों की गर्माहट से सहलाया
पन्ने - पन्ने को उसके मैंने, प्यार की गोंद से चिपका पाया

*जिलत उसकी फट चुकी थी
हर क़िरदार की पहचान मिट चुकी थी
प्यार उसके हर अक्षर में समाया था
उसमें बने दिल को आज भी धड़कता पाया था

ग़ौर से पढ़ा जब मैंने उसको, हर कहानी कुछ अधूरी थी
महक प्यार की फिर भी उसके हर पन्ने में पूरी थी
कुछ पन्नों में ख्वाब थे, कुछ में छुपे *आज़ाब थे
हर किरदार के अभिनय में रंग बेहिसाब थे

आगे के पन्नों से जब, धूल की चादर को हटाया
एक मुड़े हुए पन्ने में, मैंने अपना ज़िक्र पाया
कुछ सूखे हुए फूलों के साथ, नाम मेरा भी लिखा था
ये मत पूछो अब तुम मुझसे, कि किसने वो *पैगाम लिखा था
उस मुड़े हुए पन्ने को मैंने किताब से हटा दिया
वजूद उस कहानी का मैंने धुआं बना के उड़ा दिया

ये अधूरी कहानी भी, उसी किताब का हिस्सा है
हर लफ्ज़ में लिखा हुआ, एक प्यार का किस्सा है
आ के बैठना पास मेरे, तुम्हे हर किस्सा सुनाऊंगा
पूरी किताब का सार तुम्हें मैं ढ़ाई आख़र में समझाउंगा


*जिलत - Outer cover of the book
*आज़ाब - Sufferings
* पैगाम - message
*अल्फाज़, लफ्ज़ - Word


- मनप्रीत

शुक्रवार, जनवरी 03, 2025

नमक




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कभी आंसू बनकर पीता रहा, कभी ज़ुबां का स्वाद बनाता रहा
नमक की डली मैं ज़िंदगी भर, चटकारे ले कर खाता रहा

कभी नमक ज़्यादा खाने से ज़ायका मेरा बिगड़ गया
तो कभी कम नमक वाले खाने को मैं, बेस्वाद ही निगल गया

फीकी पड़ी महोब्बत को मैं, नमक रगड़ कर चखता रहा
सारा शहर मुझे देख, बावला समझ कर हंसता रहा

जब किसी को हाल जो मैंने दिल का अपने सुना दिया
मुट्ठी भर नमक उसने ज़ख्मों पर, दवा कह कर लगा दिया

माथे से पसीना मेरे टप-टप कर टपकता रहा
इस नमक का कर्ज़ मैं सारी उम्र भरता रहा

पर बात इतनी सी समझ नहीं आई मुझे
की चुटकी भर डालो या चमच भर, नमक वो बला है
मात्रा जिसकी बराबर रखना भी एक कला है


- मनप्रीत



शुक्रवार, दिसंबर 27, 2024

उम्र चालीस की


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उम्र ये चालीस की बड़ी अजीब होती है
थोड़ी सी मीठी, थोड़ी नमकीन होती है

सच पूछो तो ये उम्र का ही तकाज़ा है
बीस जैसी शक्ति बची नहीं और साठ का हुआ नहीं अंदाज़ा है

दौड़ते हैं तो सांस अब जल्दी फूल जाती है
और घुटनों से कुछ "कट-कट" की आवाज़ आती है

कमर में लचक अब पहले जैसी नहीं रह गई
पता भी नहीं चला जवानी कैसे बह गई

अब तो, काले बालों में से सफ़ेदी झांकने लगी है
मेरी ये "काया" भी मुझे अब कम आंकने लगी है

Fatty liver, cholestrol, BP ने अभी से
जीवन में उत्पात मचा रखा है
लगता है सारा chinese माल, भगवान ने मेरे अंदर लगा रखा है

यादाश्त भी अब टिम-टिमाने लगी है
माथे पे भी झुर्रियां नज़र आने लगी हैं

अलार्म से पहले नींद मेरी खुल जाती है
और अक्सर बैठे-बैठे सोफे पर, झपकी आ जाती है

राजमा, दाल मखनी, अब रास नहीं आती है
और घीया, टिंडे, तोरी, एक आंख नहीं भाती है

उम्र ये बहुत ज़ालिम है, ज़रा भी तरस खाती नहीं
पहले तो दूर की थीं, अब पास की चीज़ें भी साफ नज़र आती नहीं

कुछ सुधार दी बीवी ने, कुछ सुधर रही है
उम्र ये भी लगभग ठीक-ठाक सी गुज़र रही है


- मनप्रीत

मंगलवार, अगस्त 20, 2024

बच्चे हल्के, बस्ते भारी...


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कहने को तो दोस्त हैं, पर लगती अब बोझ हैं
हर अक्षर को *सोज़ बना डाला है
किताबों को स्कूल ने बोझ बन डाला है

कमी नहीं है इम्तिहान की, कमी है केवल सामान्य ज्ञान की
पर वह भी नहीं ये दे पाते हैं
इतने भारी बस्ते लेके नजाने बच्चे कैसे स्कूल जाते हैं

छुट्टियों में भी काम है, न दो पल का आराम है
प्रतिस्पर्धा की अग्नि की भेंट इनका जीवन कर डाला है
स्कूल और ट्यूशन ने बच्चों का बचपन जला डाला है

शिक्षा नीति नई हो, चाहे हो पुरानी, बदस्तूर जारी है आज भी वही कहानी
आंखों पे पट्टी बांध कर, नई शिक्षा प्रणाली को लिख डाला है
आ के देखो धरातल पर, तुमने तो केवल कांधे पर बोझ बड़ा डाला है

करना था पाठ्यक्रम 'कम' लेकिन तुमने तो बढ़ा दिया है
इतिहास पढूं या पढूं भुगोल, हर विषय को उलझा दिया है
और ऊपर से ये गणित जिसमे, जाने कैसे 'एक' में से 'दो' घटा दिया है

पर स्तिथि कुछ ऐसी है, कि बच्चे हल्के हैं, बस्ते भारी हैं
इन नन्हे- नन्हे कंधों पे डाली कितनी ज़िम्मेदारी है
माना कि ज्ञान की कोई कीमत नहीं, वह बहुत ज़रूरी है
पर बेमतलब का दबाव डालना, ये कैसी मजबूरी है?
 

*सोज़ - दर्द


- मनप्रीत

सोमवार, मई 20, 2024

मुश्किल तो ये है...

Audio version of the Poem.👇



तो जनाब, मुश्किल तो ये है...

हर बात मैं पत्नी से कह पता नहीं
और जो कह जाता हूं गलती से
मतलब उसका उल्टा निकाल लेती है वो जल्दी से

मुश्किल तो ये है...

*अव्वल तो, उसे मैं छेड़ता नहीं जान के
और अगर कभी हो जाती है मुझसे मिस्टेक
छिड़ जाता है जिंदगी में मेरी, पानीपत की जंग का री-टेक

मुश्किल तो ये है...

कि मैं भी कभी-कभी बोल देता हूं, ज़ुबान अपनी खोल देता हूं
पर सच को मेरे पहना दिया जाता है झूठ का नकाब
और आगे-पीछे कई सालों का मेरे, हो जाता है हिसाब

मुश्किल तो ये है...

कि छोटी-छोटी बातों का भी *फ़साना बना दिया जाता है
*नुक़्ते से नुक़्ते को जोड़कर
चक्रव्यू त्यार किया जाता है

बस फिर क्या ?

बिना वजह बहस में मुझे और खींच लिया जाता है
Point Blank पे निशाना रख के
मेरा शिकार किया जाता है

मानो हर और से उड़ता तीर मेरी और ही आता है
उन्हीं तीरों के वार से खुदको रोज़ बचाता हूं
सफ़ेद रुमाल हाथों में लेकर शांति का पाठ पढ़ाता हूं

पर मैं जानता हूं...
अंत में केवल सच की विजय होती है
पति तो हार जाता है और पत्नी *'अजय' होती है

* अव्वल - first
फ़साना - story
नुक़्ता - dot, बिंदू
अजय- invincible


- मनप्रीत

सोमवार, जुलाई 10, 2023

तैरता शहर गुरुग्राम...

Podcast version of the poem








चुल्लू भर बरसात में ही, शहर मेरा डूब जाता है
बारिश में गुरुग्राम घूमने का, मज़ा अलग ही आता है

घरों में पानी, रोड पे पानी, हर गली-कूचा भर जाता है
गुरुग्राम हमारा हमें फिर, Venice जैसा नज़र आता है

अलौकिक वो नज़ारा होता है
हर शख्स Cab नहीं, मानो Gandola में ऑफिस आ रहा होता है

Cybercity बनाने की चाहत में, बन हर जगह Swimming Pool गए हैं
शहर बसने से पहले, नाली बनाना भूल गए हैं

सड़क बनाई है बेचारों ने, भर के गड्ढे एक-एक
पर जब देखा तो हर घर के आगे, बन गई थी Sukna Lake

सड़क पर गड्ढे नहीं, गड्ढों में सड़क दिखती है अब
3 घंटे से निकला हूँ घर से, न जाने पहुँचगा कब

चलो, शहर तो बसा लिया तुमने, पर इसे डूबने से कैसे बचाओगे
Work from Home बहुत कर लिया हमने,
अब क्या Work from Riverside कराओगे ?

नहीं चाहिए शहर ऐसा जो हल्की रिमझिम में ढ़ह गया है
'शंघाई' बनाने का सपना हमारा, नालियों में बह गया है


- मनप्रीत

सोमवार, मई 29, 2023

रूठा हुआ चाँद...

Podcast version of the poem

कल रात चाँद कुछ उदास था तारों से भी नाराज़ था
चांदनी भी कुछ फीकी थी
सुना है सूरज की निगाहें भी दिन में तीखी थीं

मेरे लाख मनाने के बाद भी, चाँद नहीं मुस्कुराया
बादलों की *दुशाला के पीछे था उसने मुँह छुपाया
सितारे सो गए थे, वक़्त जैसे ठहर गया था
चाँद की राह देखते-देखते बीत रात का पहर गया था

बादल चले जा रहे थे
मानो चाँद के घर से वो भी मायूस आ रहे थे
तारों की टिम-टिमाहट में भी नहीं वो बात थी
क्या कहूं, वो कितनी अकेली रात थी

रात गुज़ारी हमने *फ़िराक़-ए-यार में
बैठे रहे राह ताकते हुए, चाँद के इनतिज़ार में
कभी आंखे मलते रहे, कभी पलकों को जगाते रहे
जल्द आएगा वो, ये कह के दिल को बहलाते रहे

सुबह होते-होते आखरी संदेसा पहुचाया सूरज के हाथ में
"चाहे पूरा नहीं, तो आधा आ
एक झलक अपनी दिखला के जा
आसमान के माथे की बिंदिया बनके
प्यास बादलों की बुझाता जा"

पर किरणों ने कहां, चाँद मिला नहीं कहीं खो गया है
किसी और देस में जा के, परदेसी हो गया है
उसका विश्वास मत करना, रूप उसका हर रोज़ बदल जाता है
कभी आधा, कभी पूरा, तो कभी ईद का चाँद बन जाता है

*दुशाला - चदर
फ़िराक़-ए-यार - separation from loved one

- मनप्रीत

गुरुवार, फ़रवरी 02, 2023

मिट्टी का पुतला...


Podcast version of the poem
मिट्टी के आंसू मेरे
मिट्टी के जज़्बात
इस मिट्टी के पुतले की
क्या मैं करूं अब बात

मोल हर बात का मिट्टी इसकी
मिट्टी की है ये काया
इस पुतले की "मैं" की ख़ातिर
जाने कितनों से मूंह मोड़ आया

कभी सर चढ़ के बोलता अभिमान
कभी माया का इसे गुमान
पल भर का भरोसा नहीं
कब पुतले से उड़ जाए जान

इस मिट्टी के पुतले ने
खूब मुझे नचाया
"दो रोटी" पाने की ख़ातिर
दिन का चैन गवाया

पर भेद इस बेचैन जीव का
किसी ने ना पाया
सब कुछ पाने के बाद भी
क्यों "दो पल" न सो पाया

समाज के बंधनों ने इस पुतले पे
कर रखा इख़्तियार है
जो न सुकून से जीने देता है
और न छोड़ने को तैयार है

सुपुर्द-ए-खाक (मिट्टी) होने के बाद शायद
इसे कहीं करार आए
पर डरता हूँ, कहीं कब्र में भी बद-इनतेज़ामी की
शिकायत न ये रब से लगाए


- मनप्रीत

शनिवार, जनवरी 07, 2023

आधी बातें... आधे मतलब...

Podcast version of the poem

जाते-जाते आज फिर वो बात अधूरी छोड़ गया
मेरी लिखी कहानी को, हाथों से अपने मिटो गया

कहनी थी कई बातें उसको, सुननी थीं कई बातें उसकी
पर माथे कि लकीरों को अपनी, हर बात पे मेरी सिकोड़ गया
जाते-जाते आज फिर वो बात अधूरी छोड़ गया

यूँ तो बात छुपना आता नहीं उसे
पर अपनी खामोशी के पीछे, सवाल हज़ारों छोड़ गया
जाते-जाते आज फिर वो बात अधूरी छोड़ गया

अपना समझ के मैंने उसको दिल का राज़ बताया था
पर सीधी सी बात मेरी को, वो टेढ़ा-मेढ़ा मरोड़ गया
जाते-जाते आज फिर वो बात अधूरी छोड़ गया

हर बात पे मेरी, ज़िक्र उसका ही आता था
पर देख के मुझको आज, चुपके से मूँह मोड़ गया
जाते-जाते आज फिर वो बात अधूरी छोड़ गया

तुम्ही बताओ...
साथ अधूरी बातों का, आधी हुई मुलाकातों का, जिनका रंग हमेशा ही फीका है
उन्हें ज़हन में रख के जीना, क्या ये भी कोई तरीका है?


- मनप्रीत

मंगलवार, जनवरी 03, 2023

युद्ध


कई शहर तबाह हो गए, कई घर फनाह हो गए 
इस जंग की आग में, कई अपने जुदा हो गए

ज़िन्दगी पल-पल रो रही है
हर बम के साथ, इंसानियत खो रही है

हर गली सूनी, हर बस्ती सूनी, हर घर में एक दर्द सुनाई देता है
ये शहर नहीं, आज हमें कब्रिस्तान दिखाई देता है

कोई लड़ने को है उकसाता, कोई हतियारों का अंबार लगता
अमेरिका के हथियारों का, इसी बहाने है परीक्षण हो जाता

UKRAINE-RUSSIA को लड़ता, हर मुल्क खड़ा बस देख रहा है
मुख-बधिर बनके NATO अपनी सियासी रोटियां सेक रहा है

इस युद्ध का कोई अंत नहीं, ये अब प्रतिष्ठा की बात है
तू जीते या मैं जीतूं, ये हारी हुई बिसात है

बुधवार, सितंबर 14, 2022

दर्द 'हिंदी' का..













कभी मिटाया गया है
कभी दबाया गया है
अंग्रेज़ी बोलने की चाहत में
मुझे हर पल भुलाया गया है

बोलने में मुझे गर्व नहीं
शर्मिंदा महसूस करते हैं
भाषाओं के चयन में
मुझे दो नम्बर पर रखते हैं

पढ़ने चले हो A, B, C, D...
पर ज्ञान हिंदी का अधूरा है
सच बताओ क्या तुम्हें
क, ख, ग... आता पूरा है ?

अगली बार जब बोलो इंग्लिश
एक बार मुझे याद करना
अपने लोगों के बीच में
न गैरों सा बर्ताव करना

हिंदी भाषा के ज्ञान की
आज नहीं कोई कीमत है
इसलिए मेरे बचने की
आशा बहुत ही सीमित है

माना है हर भाषा प्यारी
पर मुझे नहीं भुलाओ तुम
जिस सम्मान की मैं हूँ हक़दार
वो फिर मुझे दिलाओ तुम

पर नहीं मोहताज परिचय की मैं
सबसे पुराना मेरा इतिहास है
हर कोई बोलेगा फिर हिंदी
मुझे पूर्ण विश्वास है

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।


- मनप्रीत

रविवार, सितंबर 11, 2022

दादी-नानी की कहानी




उनके चेहरे पर तजुर्बे की झुर्रियां है
उनकी आंखों में प्रेम का एहसास है
उनकी मुस्कान में धैर्य का आभास है
उनकी बातों से जीने की सही राह मिलती है
वो हर वक़्त अक्स की तरह मेरे साथ है
इसीलिए दादी-नानी का प्यार कुछ खास हैं

उनके माथे पे संतुष्टि की लकीरें हैं
उसके साये तले सुखों की बरसात है
उनकी डांट में भी प्यार छलक आता है
ऐसा प्यार किसी-किसी को ही मिल पाता है
उनकी असीसों (Blessings) की बरकत में कुछ बात है
इसीलिए दादी-नानी का प्यार कुछ खास हैं

पर हर बच्चे को कभी-कभी दोनो का प्यार नहीं मिल पाता
कभी ज़मीन, तो कभी आसमान नहीं मिल पाता
खुशनसीब होते हैं वो, जिन्हें मिलती है दोनों आंचल की छांव
जिनके पड़ते हैं दादी-नानी की दहलीज पर पांव
दोनों के आंगन की मिट्टी में लाड-प्यार की सौगात है
इसीलिए दादी-नानी का प्यार कुछ खास हैं


- मनप्रीत