क्यों आँखें जल रही हैं
क्या ज़िंदगी की कीमत है कोड़ियों की भांति
क्यों दिन में भी धुआं है
क्यों रात है ज़हरीली
क्या समझौतों की ज़िन्दगी आज हमने जीली
क्यों मीटर AQI के लगे अब हांफने
क्यों सच्चाई के आंकड़े लगे तुम ढांकने
क्या सस्ती ज़िंदगी पर भारी है राजनीति
क्यों आसमान काला
क्यों दम ये घुट रहा है
ये साल मेरी ज़िंदगी के कौन लूट रहा है
क्यों सुट्टे सा भारी धुआं है अब सांस में
क्यों air purifier भी लगा है अब खांसने
क्या ज़िंदा और मुर्दे में फर्क नहीं है बाकी
क्यों झूठे हैं ये वादे
क्यों भ्रष्ट हैं इरादे
क्या नीयत में इनकी है खोट की मिलावट
क्यों सावधान होने का वक़्त है तुम्हारा
क्यों हर साल की ये अब बन गई कहानीजो
अब भी न खौला खून है नहीं वो पानी
- मनप्रीत
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